चौधरी चरण सिंह अभिलेखागार

कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से मतभेद ज़ारी ।

१४ मई १९६५

१४ मई को कृषि मंत्रालय वापिस ले लिया गया। वन एवं स्थानीय निकाय मंत्रालय में १४ फरवरी १९६६ से १३ मार्च १९६७ तक रहे। यद्यपि जब स्थानीय निकाय जैसा साधारण मंत्रालय सम्हाल रहे थे, तब भी उन्होंने प्रशासन में अपने सिद्धांतों को लागू करना जारी रखा।

वास्तव में, उनके दिमाग में यह बात थी कि , "कुछ उच्च पदस्थ भ्रष्ट अधिकारियों को ऐसा उदाहरण बनाया जाये जिसके चलते पूरे राज्य के स्थानिक निकायों के सेवक सावधान हो जायें। " ..... आज, लोकजीवन का स्तर काफी गिर गया है। वस्तुतः कोई भी मानक, जिसे नाम दिया जा सके, अब नहीं बचा है। बजाय इसके कि इन्हें लोकसेवा का अवसर माना जाता। अब अधिकांश लोगों की राय में लोक दायित्व के कार्यालय लाभ एवं स्वयं की उन्नति के स्रोत हैं। यदि यह स्थिति विना किसी रोकथाम के जारी रहती हैं तो उत्तर प्रदेश राज्य असाध्य रूप से गर्त में चला जायेगा। इस बात से हताश होने की अपेक्षा कि लोक-जीवन की स्थितियों में वृद्धि एक विशेष आकार लेती जा रही है, में विना किसी हिचकिचाहट के, कार्यवाही हेतु प्रस्तावित करता हूँ........." १९६६ में मेरठ म्युनिसिपल बोर्ड के एक सदस्य को निलम्बित करने पर। पॉल आर. ब्रास (२०११) एक भारतीय राजनैतिक जीवन, वॉल्यूम १, पृष्ठ १४९-१५०।

और निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों द्वारा की जा रही ऊँचे वेतन व महंगाई भत्ते के लिए किये जा रहे आंदोलनों पर उनकी राय।

"यदि जाँच कराई जाये तो ज्ञात होता है कि देश भर के सरकारी सेवकों को मिलने वाले परिलाभों की कुल धनराशि की भूमिका, आज के आर्थिक संकट को पैदा करने में कम नहीं रही है, जिसका हम दैनंदिन रूप में सामना करते हैं। सरकारी सेवक (संगठित श्रमिक वर्ग के साथ) उस साधन-सम्पन्न समाज से आते हैं, जो आमजन से पूरे तौर पर कट हुआ है। इस वर्ग के परिलाभों का उन लोगों की प्रति व्यक्ति आय से कोई संबन्ध नहीं है, जिनकी सेवा में वह कार्यरत है। दोनों के, अर्थात एक मालिक के और नौकर के जीवन में परस्पर कोई साम्य या संवाद नहीं हैं। " उ.प्र. राज्य कर्मचारियों के आंदोलन पर ३० जून १९६६ को सुचेता कृपलानी के लिखे गए कैबिनेट नोट से उदधृत।

"कुछ प्रश्न विचार के अंतर्गत आते हैं कि क्या हमारे आम जनों की औसत आय का लोकसेवकों को मिलने वाले परिलाभों से सीधा सम्बन्ध होना चाहिए अथवा नहीं। क्या केवल सरकारी सेवकों की आवश्यकतायें ही विचारणीय होनी चाहिए और उन लोगों की नहीं जिनकी जेबों से अंततः ऐसी आवश्यकताओं की पूर्ति-आपूर्ति होती है। जब मूल्य वृद्धि या महंगाई में बढ़ोत्तरी होती है तब क्या तुलनात्मक रूप से अल्प आय भोगी कर्मचारी अधिक वित्तीय सहायता पाने का अधिकारी है अथवा बेहतर वेतनभोगी कर्मचारी ? क्या उच्च वेतनभोगी अधिकारियों को कोई महंगाई-भत्ता दिया जाना चाहिए? कुल मिलाकर हमारे आम लोगों की आय और लोकसेवकों की आय के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है।" [उ.प्र. राज्य कर्मचारियों के आंदोलन पर २७ जुलाई १९६६ को इंदिरा गांधी को लिखे पत्र से उदधृत]।

"जब से आज़ादी मिली है तब से सारा जोर भत्तों के अधिकार, लाभों, श्रमिक वर्ग की सुविधा-रियायतों इत्यादि देने पर है, जबकि कठोर श्रम अथवा कर्तव्य का निर्वहन जो आज दुर्लभ गुण बन गए हैं, के बारे में कोई बात नहीं करता हैं। पश्चिम के मुकाबले भारत में कारखानों के श्रमिक उत्पादन कम करते हैं और पते ज्यादा हैं। विणा किसी संशय के कहा जा सकता हैं की यह देश में विद्यमान आर्थिक रुग्णता के कारणों में से इस है। " १८ अगस्त १९६६ को चरण सिंह द्वारा टी.न. सिंह, केंद्रीय इस्पात मंत्री को लिखे गए पत्र से उदधृत।