चौधरी चरण सिंह अभिलेखागार

कांग्रेस विधान मंडल दल और विधान सभा में प्रगतिशील एवं किसान-हितैषी विधेयक प्रस्तुत करने में सक्रिय। १९३९ में गाजियाबाद से मेरठ आ गए।

१९३८ - १९३९

उत्पादक के हितों की रक्षा और आढ़तियों तथा व्यापारियों के उत्पीड़न से उन्हें बचने के लिए उत्तर प्रदेश धारासभा में प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट बिल (कृषि उत्पादन विपणन बिल) प्रस्तुत किया। यद्यपि निहित स्वार्थों के चलते यह बिल पारित न हो सका, बहुत बाद में जब िफ १९६४ में प्रदेश के कृषि मंत्री बने, तब जाकर पारित हुआ। कहते हैं की चरण सिंह द्वारा प्रस्तुत इस बिल के प्रारूप पर आधारित पंजाब सरकार ने अपने यहां मंडी समिति एक्ट १९४० में ही पारित कर दिया था।

संयुक्त प्रान्त के प्रभावी प्रशासन में, विशेषकर पुलिस एवं लोकसेवा के क्षेत्र में प्रगति के अभाव के कारण, मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत के समक्ष विरोध प्रकट करने के लिए कांग्रेस के विधायकों के दबाव गुट का नेतृत्व किया।

०५ अप्रैल १९३९ को कांग्रेस विधान मंडल दल की कार्यसमिति के समक्ष प्रस्ताव रखा, जिसमें खेती करने वालों और किसान-संतानों एवं आश्रितों के लिए लोक सेवा के अन्तर्गत रिक्तियों में ५०% का आरक्षण दिए जाने की मांग की गई। हालाँकि पार्टी द्वारा उदासीनता बरतते हुए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया।

उन्होंने जमींदारी उन्मूलन के विषय का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया। वह भूमि-उपयोग बिल का व्यवस्थापन करते हैं, जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार बिल की प्रस्तावना करते हैं, साथ ही भूमि का मालिकाना हक़ उन काश्तकारों अथवा भूमि को वास्तविक रूप से जोतने वालों के पक्ष में हस्तांतरित करने की मांग करते हैं जो उनके द्वारा जोती गई भूमि के वार्षिक लगान का दस गुना देने पर सहमत हैं। इस बिल का ज़मींदारों ने कड़ा विरोध किया। फलस्वरूप इसे विधान सभा में नहीं रखा जा सका । उन्होंने काश्तकारों के हितों की रक्षा में एवं उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अनेकों उपाय सुझाये तथा इस विषय में कई लेख प्रकाशित किये। इसके साथ ही कांग्रेस विधान मंडल दल के समक्ष , शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के इच्छुक अथवा किसी भी सरकारी सेवा में भर्ती के सन्दर्भ में अनुसूचित जाति को छोड़कर हिन्दू की किसी भी अन्य जाति के बारे में पूछताछ पर निषेध प्रस्तावित किया।

काश्तकारों को सहायता उपलब्ध करने के उद्देश्य से, जिसमें उत्तर प्रदेश के अधिकांश किसानों को ऋण और ऋणदाता साहूकारों के चंगुल से मुक्त करने हेतु संयुक्त प्रांत कृषि काश्तकार एवं कामगार ऋण विमोचन बिल के व्यवस्थापन एवं पारित कराने में प्रमुख भूमिका निभाई और हजारों-हजार किसानों को उनकी भूमि को सार्वजनिक नीलामी से बचाकर लाभ पहुँचाया।

कांग्रेस सरकार के नवंबर में त्यागपत्र देने के बाद, १९३९ में वह ग़ाज़ियाबाद से मेरठ आ गए। १९४६ तक मेरठ जिला कांग्रेस के अध्यक्ष अथवा महासचिव पद पर रहे। किसान-काश्तकारों के हितों के लिए प्रमुख प्रवक्ता के रूप में स्वयं को स्थापित करते हुए उन्होंने अपनी पार्टी के समक्ष एवं विधान मंडल में उनकी ओर से अनेक प्रस्ताव रखे।

१७ जुलाई १९३७ से २ नवंबर १९३९ तक संयुक्त प्रांत धारासभा जारी रही ।

१२ फरवरी १९३९ को पांचवे पुत्र अजित सिंह का जन्म।