चौधरी चरण सिंह अभिलेखागार

तेवतिया कुटुम्ब ने बल्लभगढ़, फरीदाबाद में अपना प्रभाव बढ़ाया। १८५७ के क्रांतिकारी नाहर सिंह को उनके क्रांतिकारी भूमिका के लिए अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया, उन्हीं के वंशज बादाम सिंह यमुना पार चले आये।

१७०७ - १८६०

१७०७ – १८६० तेवतिया कुटुम्ब ने बल्लभगढ़, फरीदाबाद में अपना प्रभाव बढ़ाया। १८५७ के एक क्रांतिकारी नाहर सिंह को उनके क्रांतिकारी कार्यों के लिए अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया, उन्हीं के वंशज बादाम सिंह यमुना पार कर आये। तेवतिया, मेहनतकश जाट समुदाय के किसानों का एक गोत्र, बल्लभगढ़ जिले के सीही ग्राम (दिल्ली के दक्षिण में आज के हरियाणा में) रहते थे। मुग़ल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत मुग़ल साम्राज्य के सिकुड़ने के साथ ही उन्होंने अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम किया। मुग़ल दरबार की ओर से गोपाल सिंह को १/१६ के अनुपात सेमालगुजारी वसूलने का दायित्व सौंपा गया, और इस प्रकार उसके गोत्र के प्रभाव बढ़ने की शुरूआत हुई।

अगले १५० वर्षों के दौरान तेवतिया स्थानीय स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाता रहे, गोपाल सिंह के वंशज नाहर सिंह (१८२३-१८५८ ) छोटी सी रियासत बल्लभगढ़ (जिसमें १२१ गांव शामिल थे) के प्रमुख बने, और १८५७ के आज़ादी के समर में एक क्रांतिकारी भूमिका निबाही। अंग्रेजों द्वारा उनको पकड़ कर, उनके १७ साथियों सहित, चांदनी चौक में फांसी पर लटका दिया गया। उनकी इस असफल क्रांति के चलते उनके कबीले के लोगों को अंग्रेजी फ़ौज की लूटपाट और कोप से बचने के लिए बल्लभगढ़ से दूर सुरक्षित गांवों में शरण लेनी पड़ी (जाट वंशजों के ऐतिहासिक ग्रंथों में ऐसा कहा गया है) ऐसे ही उनके वंशज बादाम सिंह भविष्य की नई संभावनाओं को देखते हुए यमुना के पार ६० किलोमीटर दूर अपने संगोत्रीय भटौना गांव, जो गंगा के इधर सीही गांव से ३० किलोमीटर पड़ता था (गंगा-यमुना के दोआब में) आ बसे । उनके पांच बेटे थे, सबसे बड़े लखपत सिंह और सबसे छोटे मीर सिंह।