चौधरी चरण सिंह अभिलेखागार

चरण सिंह दूसरी बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत के संसदीय सचिव चुने गए

१९४६

गोविंदबल्लभ पंत (१८८७-१९६१) संयुक्त प्रान्त के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) चुने गए। चरण सिंह उन्हें अपने पिता सामान मानते थे, और उस दौर को, जब उन्होंने जी.बी. पंत के साथ काम किया (१९४६-१९५४) अपने जीवन का "सुनहरा दौर" मानते हैं। (१९८१ में दिल्ली में एक भाषण के दौरान)

वह उत्तर प्रदेश धारा सभा के लिए मेरठ जिले (दक्षिण-पश्चिम) से दोबारा चुने गए। उन्होंने चुनाव आम जनता से लिए पैसे से लड़ा - अमीरों से कोई पैसा नहीं लिया, अपने पूरे राजनितिक जीवन में वह इस आदर्श पर कायम रहे।

गोविन्द बल्लभ पंत की कांग्रेस सरकार में वह संसदीय सचिव नियुक्त किये गए। सरकार में ६ मंत्री और लालबहादुर शास्त्री (बाद में भारत के प्रधानमंत्री) एवं चन्द्रभानु गुप्त (उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री तथा चरण सिंह प्रमुख राजनितिक विरोधी) सहित १२ संसदीय सचिव थे।

१९५१ तक स्वास्थ्य मंत्री, स्थानीय निकाय, और अंततः प्रीमियर (तब मुख्यमंत्री को यही बोला जाता था) के तहत संसदीय सचिव पद पर रहे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (इ.आई.सी.सी.) के सदस्य रहे। उन जमीनों से जिन्हें काश्तकार जोत रहे थे, बेदखली से संरक्षण के लिए, यूं.पी. काश्तकारी अधिनियम में संशोधन किया तथा एक जनवरी १९४० से बेदखल किये गए सभी काश्तकारों को बहाल करवाया।

कांग्रेस संगठन की कमजोरियों यथा-- उच्च शहरी जातियों के हाथों नेतृत्व, जातिवाद, व्यक्तिगत विरोध, स्वार्थपरायणता, एकता का अभाव, कमजोरों का दमन और कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं को आंदोलन के तौर-तरीकों में शामिल करने से लेकर समस्याओं की न जानकारी और भारत की गहरी पैंठी समस्याओं को हल करने की दिशा में असफल रहना।