चौधरी चरण सिंह अभिलेखागार

"भारत छोड़ो आंदोलन" के दौरान १३ माह के लिए पुनः जेल भेजे गए, छोड़े जाने पर पुनः दीवानी वकालत शुरू की

१९४२

"भारत छोडो आंदोलन" के दौरान २३ अक्टूबर १९४२ से नवम्बर १९४३ के अंत तक तीसरी बार जेल गए। जेल भेजे जाने से पहले उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष में गाज़ियाबाद, हापुड़, मवाना, सरधना और बुलंदशहर के इलाकों में भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व किया, रिहा होने पर पुनः वकालत शुरू कर दी किन्तु बहुत अच्छी नहीं चली, क्योंकि जिन्हें वह झूठा फर्जी समझते थे, उन केसों को नहीं लेते थे। परिश्रम और गरीबी की जिंदगी जीते हरे। कथित रूप से वह कहते हैं कि "वकील होने के नाते यह उनकी मज़बूरी/बाध्यता है, किसी लाभ के लिए वह यह काम नहीं नहीं करते।"

जो उन्हें जानते हैं, उनके लिए जीवन शैली की सादगी "उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनकी सादगीपूर्ण जीवन शैली से भलीभांति परिचित रहा। यद्यपि वह कोई अनुभवहीन या भोले-भाले किसान नहीं थे। चरण सिंह अपने अधिकांश राजनीतिक साथियों तथा विरोधियों की अपेक्षा बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ थे, जबकि आज़ादी पूर्व के नेताओं में बहुत से उच्च शिक्षित थे। " - पॉल आर. ब्रास, पृष्ठ ८२

छठी एवं अंतिम संतान, पुत्री शारदा का जन्म २३ दिसम्बर को हुआ